49 दिन आध्यात्मिक शुद्धिकरण – सप्ताह १:

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पहले हफ्ते कि दिनचर्या में आपका स्वागत है ।हमें अपने प्लान से अधिक लाभ पाना है, इसलिए ४९ दिन तक रोज़ रुकावट के बिना अभ्यास करें।यह केवल शारीरिक विषहरण ही नहीं ,बल्कि आध्यात्मिक पवित्रीकरण भी है जिसका शरीर एवं मानसिक स्थिति पर प्रभाव पड़ता है, जिससे स्वस्थ रह सकते हैं।हम आप से सिफारिश करते हैं कि पवित्रीकरण के साथ साथ आप ज़रूर रोज़ २१ मिनट का ध्यान अभ्यास करें, जिससे अद्भुत परिवर्तन दिखाई देगा क्योंकि दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं।

छोटे एवं आसान कार्य, बिना एक दिन भी रुकावट के बिना ४९ दिन तक ज़रूर पूरा करें क्योंकि, ठीक से करें तो संचयित प्रभाव पड़ता है।
इन ४९ दिन में आपके पास उस एक दिन की सामग्री नहीं है तो आप उस दिन हल्दी का इस्तेमाल कर सकते हैं एवं अगले दिन आप अपने दिनचर्या कि सामग्री तैयार रखें।

सप्ताह १:

इस हफते में हम ओंकार का उच्चारण एवं थोड़े श्वास के व्यायाम, सूरज के नीचे खडे़ होकर ,सूर्य नमस्कार के साथ करेंगे। पवित्रीकरण के लिए बिल्व पत्र, तुलसी के पत्ते एवं हल्दी का उपयोग करेंगे।

  • सूरज,सनातन धर्म के अनुसार सूर्य भगवान उच्चतम चेतना का प्रतीक है।कयी योगी अपने शरीर को सूरज के प्रकंपन्नों कि वजह से बरकरार रखें क्योंकि, सूरज एक दिव्य कायाकल्प है।यह भूमि का प्रकाश स्त्रोत एवं निर्माता और विनाशक भी हो सकता है।अत्यंत भक्ति भाव से सूर्य भगवान को झुककर प्रणाम करें।
  • ओंकार – ओंकार महामंत्र है। इसे ब्रह्मा ,विष्णु और शिवजी का प्रत्यक्षीकरण माना जाता है।हर एक मंत्र के उच्चारण से पहले इसको कहा जाता है और सभी पूजा एवं मंत्रों से पहले इसका उच्चारण किया जाता है।ओंकार इतना शक्तिमय है कि ,अगर नाभि से उच्चारण करें तो बीज एवं संसकरण का नाश करता है एवं अचेतन मन से निकलता है।यह आध्यात्मिक उन्नति के लिए सहायक है क्योंकि इस पथ पर बीजों को हटाकर, बाधाओं का हरण करता है ओंकार में ‘ओ ‘ से ज्यादा ‘मा’कार का लंबा उच्चारण करेंगे।उदाहरण केलिए ‘ओ ऊ म म म म ‘।
  • साँसों का ,आध्यात्मिक एवं भौतिक महत्व है।यह शरीर के लिए शक्ति प्रकंपन्न है।यह शरीर, मन एवं आत्मा को जोड़ता है।श्वास शरीर में लेने से एवं श्वास बाहर छोड़ते वक्त हमारा पूरा शरीर पवित्रीकरण होता है ।जब आप साँसें अंदर ले रहे हों,तब आपके भाव वैसे होने चाहिए कि, सकारात्मक खैयाल अंदर ले रहे हों जैसे आरोग्य, शांति, ऊर्जा।जब साँसों को बाहर छोड़ रहे हों, तब आपके भाव वैसे होने चाहिए कि ,नकारात्मक खैयाल जैसे अनारोग्य, तनाव, अशांति, गुस्सापन सब शरीर से बाहर जा रहें हो।सूर्य नमस्कार या सूर्य वंदना अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि ,यह पूरे शरीर को अंदर से पवित्र करता है और योग का भी हिस्सा होता है।यह मासपेशियों को मजबूत करता है एवं ग्रंथियों और अंगों के समुचित कार्य करके हमारे प्रतिरक्षक को सुधारता है।कयी प्रकार की बीमारियाँ सूर्यनमस्कार से ठीक हो जाती हैं।यहाँ दिया गया सूर्य नमस्कार पौराणिक विधी से बिलकुल अलग और आसान है।
  • बिल्व पत्र भगवान शिव का प्रिय माना जाता है और यह ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर का स्वरूप माना जाता है।औषधीय गुणों के साथ यह शरीर में ऊर्जा परिवर्तन लाता है।यह आज्ञा चक्र को पवित्र करके आध्यात्मिक ज्ञान लाता है।ये साँसों  कि ,असुविधाओं से राहत देता है और उपयोगी जड़ी बूटी है।
  • तुलसी को पवित्र माना जाता है क्योंकि तुलसी के पत्ते आयुर्वेद में धार्मिकता से जुड़ा है।इसके औषधि गुणों के कारण यह भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ देता है,इसी कारण इस प्रकृति के औषधियों में तुलसी को’ माँ ‘माना जाता है।इसे मंदिरों में पवित्र जल में उपयोग किया जाता है।दूषित हवा को पवित्र करता है एवं चम्तकारी उपचार है।यह तंत्रिका तंत्र को शांत भी रखता है|
  • हल्दी भारत के पौराणिकताओं में हल्दी शुभ एवं मंगलसूचक मानी जाती है, क्योंकि यह पवित्रता एवं समृद्धि लाता है और यह भी कहा जाता है कि, हर एक घर हल्दी के बिना अधूरा है।यह इतना शक्ति पूर्ण है कि कैंसर का इलाज भी होता है।यह आध्यात्मिक पवित्रता एवं शरीर के दोष एवं पंच कोशों को शुद्ध करता है।यह शरीर के रक्त कणों एवं चक्रों और नाडीयों को शुद्ध करके प्राण शक्ति को शरीर में आसानी से ऊर्जा प्रवाह करने देता है।
  • नीम पेड़ का हर एक हिस्सा उपयोगी है,पर नीम के पत्तों का अधिक्तर औषधि लाभ है।इसको माता का अवतार माना जाता है एवं आधुनिक पुस्तकों में ‘मुरादें परीपूर्ण करनेवाला पेड़ ‘माना जाता है।यह शरीर को प्रतिरक्षक प्रदान करता है।और किसी भी प्रकार त्वचा के रोग को दूर करता है| इसमें शरीर को गर्म , उत्तेजक और रोगाणुरोधक एवं रक्त शुद्ध करनेवाले गुण हैं।इसे प्रसाद रूप में दिव्य प्रकृति से लेकर उपयोग करें।

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