Day 35 – गंगा कि क्षिप्रिका से निकाले सिले

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ध्यान स्थिति से बाहर आकर माताजी जल्दी चलते पास ही गंगा नदी में उतरे। माताजी क्या कर रही हैं, यह समझने से पहले ही वे तेज प्रवाह होते नदी में से एक एक गुठली निकालकर शिष्यों को देने लगे। माताजी के समीप खडे हममे से कुछ लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ कि किसी को भी नदी कि गहराई का अनुमान नहीं था। आवाम उस ठंड वातावरण में माताजी संकोच बिना, बडी सुलभ से गंगा में उतरे। वहाँ पर गंगा कि रफ्तार तेज थी। प्रवाह के कारण नदी के नीचे कुछ  भी दिखाई नहीं दे रहा था। प्रवाहित होनेवाला नदी स्वच्छ  दिख रहा था। माताजी उस ठंडी पानी मे खडे होकर पानी मे कई प्रकार के पत्थर निकालकर हमारे हाथों में देने लगीं। हम सब जल्दी जल्दी उनके पास गए,  उनसे स्वीकृत किए। उस ठंड पानी कि प्रवाह में माताजी कम से कम १० मिनट रही। वहां भीषण ठंड था। माताजी जब गुठलियों को निकालकर देने लगे तब गुठलियाँ भी ठंडी थी। उतने ठंडे पानी में इतने देर तक माताजी का रह जाना हमे बहुत आश्चर्य लगा। उस दिन हम सब माताजी को एक अलग स्थिति में देखे ।वो प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद माताजी वहां से तेजी से निकल पडे।उस दिन सारे सुषुम्ना क्रिया योगी माताजी के संग तेजी से चल ना सके, वो दिन आज भी मुझे याद है। वहाँ से माताजी उनके काटेज में चले गये। माताजी ने उस दिन पानी भी नहीं पिया ।माताजी मौन स्थिति में काटेज में ही रह गये। सभी माताजी के मौन और आलौकिक स्थिति को देखकर व्याकुल  रह गये ।
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