Day 36 – श्रीचक्र पर्वत

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माताजी के काटेज के दाइने भाग में भी एक सुवर्ण पर्वत था।अंदर माताजी सुषुम्ना क्रिया योग कर रही थीं।वो पर्वत अनेक रंग बदलने लगा।उस पर्वत को देख ऐसा लग रहा था कि,निद्रावस्था से जागकर,चैतन्य होकर,सुषुम्ना द्वारा प्रसार होते हुए सहसरारा को स्पर्श करते समय,मानो कुंडलिनी शक्ति खिलते हुए सहास्रादल पद्मम कि सुवर्ण कांतियों के जैसे दिखाई दे रही थी।उस पर्वत पर एक तरफ सूर्य कांति और एक तरफ चंद्र कांति प्रसार हो रहा था।सूर्य कांति के वजह से लाल रंग में और चंद्र कांति के वजह से सफेद रंग में दिखाई दे रहा था। इन दोनों के एकिकृत कांति कि वजह से वो पर्वत सुवर्ण रंग में दिखाई दे रहा था।सूर्य चंद्राग्नि के मिलान के वजह से जो अमृत धारा बहती है,उसके प्रतीक इस पर्वत के दक्षिण दिशा से गंगा प्रवाह होती है।वो पर्वत श्री यंत्र जैसे दिखाई देने लगा।गुरूवों कि लीला के आनुग्रह से, योग मुद्रा द्वारा हमारे सूक्ष्म शरीर में स्थापित होने वाले श्री यंत्र को भौतिक रूप में इस पर्वत के द्वारा हमने शायद दर्शन किया।वैसै अद्भुत प्रांत में हम सुषुम्ना क्रिया योगियों का निवास करना, कितना आश्चर्य कि बात है न?

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