Day 43 – पवित्र गौरी शंकर पीठ के रहस्य

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महावतार बाबाजी उनके ४९शिष्यों के साथ विश्व कार्य को निर्वाह कर रहे हैं। गौरी शंकर  पीठ पहुंचना मनुष्य मात्र केलिए इतना आसान नहीं है। उस प्रदेश में जाने केलिए बहुत योग शक्ति कि ज़रूरत होती है। माताजी हमसे,अपनी दिव्य अनुभूति के बारे में ऐसे कहने लगे “हिमालयों में ऊँचे शिखर दिखाई देते हैं न? परंतु वह प्रांत,समक्ष है।पूरा जगह हरा-भरा है। सामान्य मानव अगर वहां आने की कोशिश करता है तो,३६०योजन दूरी पर ही वो मानव राह भटक जाता है। आश्रम कि चारों ओर एक शक्ति रेखा जैसा कवच,उस आश्रम की रक्षा करता है।उस शक्ति को ठेककर सामान्य मानव उसमें प्रवेश नहीं कर सकता है।रात में भी वह पूरा प्रांत कांतिमय रहता है। वहां पर प्रस्तुत शिखर के थोडे नीचे,सहजरुप में स्थापन हुए गुफाएँ हैं। उस शिखर के दाँए दिशा में छोटा शिवलिंग दर्शण देता है। उस मरकत शिवलिंग पर निरंतर अभिशेक होता ही रहता है। वह पवित्र जल धारा कहाँ से प्रवाह हो रहा है, यह मालूम नहीं होता।एक पतली धारा शिवलिंग पर पडकर नीचे की ओर प्रवाहित होता है। शिवलिंग के आगे,एक धुनी जलता रहा है। धुनी से, नीम के झाड़ को आग लगाते समय जो कड़वा सुगंध आता है, वह आता रहा है। उस शिवलिंग के थोड़े बाएँ तरफ, एक बड़ा पत्थर का सिंहासन जैसा है। वह पत्थर का आसन मानवों से निर्माणित नहीं है। वह सहज से अपने-आप निर्माण हुआ। वहीं पर महावतार बाबाजी आसन करते हैं।

 
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