डाँ.पी.सुरेश वर्मा के अनुभव

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इस आध्यात्मिक मार्ग में सुरेश वर्मा जी कहते हैं कि, ” सुषुम्ना क्रिया योग में मेरा आगमन मेरा प्रयास नहीं ..बल्कि गुरुओं ने ही मुझे यहां तक मेरा मार्गदर्शन कराये। उनकी अनुमति और दया के बिना, हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं ”, हम बहुत ही अच्छे, मोती जैसे अनुभवों को प्राप्त कर सकते हैं।
जिस तरह एक छात्र को इंटरमीडिएट पास करने के बाद उच्च अध्ययन के लिए भेजा जाता है, उनके गुरु श्री शिरडी साईं बाबा ने उनको, सुषुम्ना क्रिया योग का मार्ग प्रशस्त किया था। उनको ऐसा लगता है कि ध्यान के पहले सत्र से याद रखने लायक कुछ भी नहीं था… लेकिन उसके बाद ध्यान करते समय उन्हें माताजी के दर्शन करने की तीव्र इच्छा उठी। “मुझे क्या करना चाहिए?” उन्होंने श्री स्रीधर राजू जो एक क्रिया योगि हैं उन्से पूछा। “अपना ध्यान शुरू करने से पहले, ध्यान में आप कि प्रार्थना का अनुरोध करें । यह निश्चित रूप से पूरा होगा ”- उन्होंने यह निर्देश दिया… .शिक्षण का पालन करने के बाद उन्होंने, केवल माताजी के दर्शन के लिए प्रार्थना की, भले ही वह केवल एक मिनट के लिए हो सके। बदले में श्री सुरेश वर्मा जी को माताजी को ध्यान में देखने केलिए आधे घंटे का मौका आशीर्वाद के रूप में मिला।
उनके विचार में, माताजी के बराबर और कोई दूसरा गुरु नहीं है… ”हम बहुत सारी चीजों के बारे में बात करते हैं, और वो सभी अपने आप पूरी हो जाती हैं जैसे कि किसी ने यह सुना हो और हमारे लिए उन्हें पूरा किया हो। ऐसा लगता है कि जैसे माताजी हर जगह में मौजूद हैं। हमारे कार्य कितनी तेजी से पूरे होते हैं, यह हमारी विचारधारा और साधना की तीव्रता पर निर्भर करता है” इस प्रकार श्री सुरेश जी ने कहा, वे कई सुषुम्ना क्रिया योगियों के लिए एक मार्ग सूचक हैं। “यदि आप तुरंत परिणाम चाहते हैं, तो १००% आत्मसमर्पण करें” – यह उनका मंत्र है।
कासी से वापसी की यात्रा में, एक भयानक दुर्घटना के बावजूद, उनके परिवार के किसी भी सदस्य को प्रभावित नहीं हुआ था … एक छोटा घाव भी नहीं … इसका मतलब है कि माताजी का आशीर्वाद था!’ यह उनका विश्वास है। “जब हमारे पास इतने अच्छे गुरु मौजूद हैं, तो हमें आगे का खोज बंद कर देनी चाहिए। आइए हम खुद को आत्मसमर्पण करें और उन बातों को सुने जो माताजी हमें बताती हैं … हमें इस धरती पर आने का उद्देश्य के बारे में जानें और हमें क्या करना चाहिए … आइए हम उन कार्यों को पूरा करते हैं … हम सब यंत्रो के रूप में कई सुषुम्ना क्रिया योगियों को बनाने का कार्य करें और माताजी के चरण कमलों में यह काम अर्पण करें … यह पर्याप्त है … बाकी सब हमारी माताजी द्वारा ध्यान रखा जाएगा।” – अथवा, श्री सुरेश वर्मा जी सुषुम्ना क्रिया योगियों को उनकी जिम्मेदारियों को याद दिलाते हैं।
क्योंकि उनके पास यह उल्लेखनीय है ” और कोई नहीं केवल तुम हो (‘अन्यथा शरणम् नास्ति ‘) का आस्था है। काशी गुरुपूर्णिमा में ध्यान करते समय इनको एक अद्भुत दृष्य दिखाई दिया―हिमालय में ,हरे–भरे के बीच में,नारंगी वस्त्र पहने हुए श्री आत्मानंदमयी माताजी ने मिट्टी में एक बिगाडा़ खोदे,वहाँ एक श्री चक्र बना रहे थे। जैसा कि श्री चक्र को गोबर के पानी से धोया जा रहा था, यह एक सुवर्ण श्री चक्र में बदल रहा था। उस श्री चक्र पर , त्रिशुल और ढमरुका ने आकार लिया। अन्य सुषुम्ना क्रिया योगियाँ भी वहाँ पर मौजूद थे… एक बार जब श्री चक्र ने अपना पूर्ण रूप धारण कर लिया था, माताजी का रूप बदल गया – एक स्वर्णमयी चेक साड़ी और आभूषणों से सजी वह श्री चक्र अर्चना कर रही थी। ऊपर से आ रही अभिषेक दूध कि धारा के साथ, वहाँ हर सभी के पैर जलमग्न हो गए … पूजा के बाद सुरेश जी एक नदी के जैसे, एक अद्भुत जल प्रवाह को देखा। बगल की गुफाओं में, प्रसाद तैयार किया जा रहा था …। अचानक भगवान शिव और माता पार्वती गायब हो गए और श्री वेंकटेश्वर स्वामी दिखाई दे रहे थे। माताजी उनकी आरती उतारते, उनको दिखाई दे रहा था। यह सुंदर दृष्य श्री सुरेश वर्मा जी का अनुभव था। श्री सुरेश वर्मा के अनुभव कई सुषुम्ना क्रिया योगियों को दिशा प्रदान करते हैं।

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