ज्योति तिरूमलाराजू के अनुभव

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सुषुम्ना क्रिया योगियों के अनुभव बाकी लोगों कि तुलना में सबसे अलग हैं। … क्या उन्हें इसके लिए किसी पात्रता की आवश्यकता है? इस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। यदि उनके पास गुरुओं का आशीर्वाद है, तो कर्म का नाश हो सकता है और मृत्यु के बाद भी उनके जीवात्मा के दर्शन हो सकता है। … ये सभी अनुभव एक साधारण व्यक्ति के लिए आश्चर्य की बात है।
विजयनगरम ज्योति जी एक सुषुम्ना क्रिया योगी हैं।२०१५ वर्ष में विजयादशमी पर उनके बेटे की मृत्यु के बाद से, उनका जीवन अंधकार से भर गया था। लेकिन किसी तरह उन्हें इस बात का भरोसा था कि एक दिन माताजी की कृपा के कारण वह निश्चित रूप से अपने बेटे को देखेंगी …
ज्योति जी अपने ध्यानी मित्रों के संग अमरनाथ यात्रा पर गई थीं और उस रात वे सब वहीं सो गए थे। ज्योति जी योग मुद्रा रखकर ध्यान करते हुए गहरी नींद में फिसल गईं, उनके पुत्र ने उनको दर्शन दिए और कहा कि तुम मेरे बारे में दुखी क्यों हो रही हो माँ? , माँ! मैंने अपने शरीर को छोड़ने के बाद अपने सारे कर्मकांड (मृत्यु केबाद किया गया कार्य) देखा है – उसने कहा। तब तुम शरीर में वापस क्यों नहीं आए बेटा?! करके ज्योति जी ने पूछा तो,उसने कहा एक बार जब शरीर छोड़ दिया जाता है, तो उस शरीर से कोई काम नहीं रह जाता है। मैं भगवान के करीब रह रहा हूं .. आप पीड़ित हैं और अनावश्यक रूप से मुझे इस पृथ्वी पर वापस ला रही हैं माँ ! मेरे बारे में चिंता मत करिए माँ! यह कहकर उनका बेटा चला गया।
उस यात्रा के बाद, गुरुपूर्णिमा के लिए शिरडी में, माताजी ने उनके पुत्र के नाम पर यज्ञ कुंड में समिधा ( नाम पर यज्ञ कुंड में अर्पण) की पेशकश की। शिरडी बाबा जी ज्योति जी के पुत्र के साथ उस रात प्रकट हुए जब वह शिरडी में योग मुद्रा में बैठे कर ध्यान कर रही थी। माँ! मैं शिरडी बाबा जी के साथ हूँ … मेरे कर्म का कोई फल मेरे झोली में नहीं है, देखिये माँ यह एक खाली थैला है। माँ कृपया अपने विचारों के वजह से मेरे बैग में कर्म के फल न डालें! ये सब कहते हुए वह शिरडी बाबा जी के साथ चले गया। ज्योति जी कहती हैं कि उन्हें शिर्डी बाबा जी का स्पर्श और अपने बेटे का स्पर्श भी अच्छी तरह से याद है। शिरडी बाबाजी ने ज्योति जी को आदेश दिया कि “मेरे दर्शन करने आओ”! अगली विजयादशमी का मतलब है कि, उनके बेटा शरीर छोड़ने के ठीक एक साल बाद, जब वह ध्यान कर रही थी और बहुत दुखी महसूस कर रही थी, माताजी प्रकट हुईं और कहे “इस साल आपका बेटा मेरे साथ है। आप उदास क्यूँ हो? जब माताजी ने यह कहा – उन्हें एक जबरदस्त संतुष्टि मिली और धन्यवाद के साथ उनकी आँखों से खुशी के आंसू बहे।
सुषुम्ना क्रिया योग के अभ्यास से मेरे पुत्र के कर्मों का फल समाप्त हो गया। मेरे बेटे को गुरु के करीब रहने का सौभाग्य मिला। ज्योति जी इस अनुभव के माध्यम से यह पुष्टि करती हैं कि यज्ञ में सुषुम्ना क्रिया योगियों की भागीदारी से वे गुरुओं के दिव्य आशीर्वाद और प्रेम को प्राप्त करते हैं। इतना ही नहीं हम यह भी समझ सके कि जो लोग गुज़र चुके हैं, उन्हें पृथ्वी की निकटता में अत्यधिक दुख होकर नहीं बुलाना चाहिए।

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