प्रमीला जी के अनुभव

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हमारे प्रारब्ध कर्म (हमारे द्वारा पिछले जन्मों से लाए गए कर्म) को साफ़ करने के लिए हम अपने गुरु के प्रति हमेशा आभारी हैं।कैसा महसूस हुआ होगा जब उनको पता चला कि उनके गुरु कोई और नहीं, बल्कि “परमयोगिनी” है, जिन्हें हमारे लिए हिमालय गुरुओं ने भेजा है? कैसी अद्भुत और धन्य स्थिति ये है।
यथा ये एक शिष्य प्रमीला जी का अनुभव है।उन्होंने २०११ में माताजी से दीक्षा लेकर वे अपने पिछले जन्मों के कर्म परिणामों के कारण अपने ध्यान में अच्छी तरह से आगे बढ़ रही थीं। माताजी उन्हें योग ध्यान मुद्रा में दिखाई देती थीं। उनके एक स्वप्न में ,एक स्वामीजी प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा, ” सुषुम्ना क्रिया योग एक शक्तिशाली साधना है और अगर इसे समर्पण के साथ किया जाये तो, मोक्ष प्राप्त होगा।”
सुषुम्ना क्रिया योग दीक्षा लेने से पहले, उन्होंने गोमुख (गंगोत्री ग्लेशियर और भागीरथी नदी का स्रोत) का दर्शण करे । उनको बताया गया कि एक महायोगिनी वहाँ एक पेड़ के नीचे कठोर ध्यान कर रही थी। लेकिन उनको उस महायोगिनी को दर्शन करने का मौका नहीं मिला।
श्रृंगेरी गुरुपूर्णिमा- ऐसा स्थान है जहाँ पर उन्होंने माताजी के साथ नज़दीक से गुज़ारा। यह एक ऐसा स्थान था, जहाँ स्वयं शंकर भगवत्पाद घूमे। वहाँ प्रमिलाजी अपने ध्यान के दौरान योग निद्रा में फिसल गईं। उनके सपने में, वह गोमुखम में वापस चली गई जहाँ पवित्र गंगा नदी ’ओमकारा’ ध्वनि के माध्यम के साथ बह रही थी।

उन्हें एक व्यक्ति को देखा जो गुफा से बाहर आ रहे थे जिन्से एक दिव्य आभा प्रकट हो रहा था। वे उनके पास पहुंची और तपस्विनी को देखने का अनुरोध किया। वो व्यक्ति उन्को लेजाते हुए कहते हैं कि “आओ मैं तुम्हें वहां ले जाऊंगा” और उन्हें एक बड़े पुराने विशाल वृक्ष के पास ले गये, जिसमें सामने की ओर एक बड़ा सुराख था। वहाँ प्रवेश होने पर, उन्होंने ध्यान मुद्रा में बैठे एक महायोगिनी को देखा।वो दिव्य महायोगिनी को ध्यानपूर्वक अवलोकन करने के बाद, वे जान गई कि यह हमारे प्रिय माताजी श्री श्री श्री आत्मानंदमयी जी हैं। ख़ुशी से उन्होंने स्वामी जी के ओर देखा, जिन्होंने उनको राह दिखाया और उनसे कहा कि मुझे इस दिव्य माताजी से दीक्षा मिली है। । तब माताजी ने एक सुखद मुस्कान के साथ कहा “क्या आप जानते हैं कि वो कौन है? वह कोई और नहीं बल्कि खुद महावतार बाबाजी हैं ”। प्रमिलाजी परमानंद स्थिति महसूस करे और शब्दों के परे हुए। बाद में, उन्हें पता चला कि माताजी, पिछले जन्म में उसी पेड़ के नीचे ध्यान साधन करें। बाबाजी ने उन्हें उस पूर्व समय की अवधि का दर्शन दिया था।
एक अन्य अवसर पर, प्रमिलाजी बिना किसी आरक्षण के हैदराबाद में माताजी के दर्शन करने के लिए ट्रेन में सवार हुए। एक महिला थी जो उनकि सीट के सामने बैठी थी,उनको अपना सीट देते हुए कहा कि उनको अगले डिब्बे में पक्की सीट मिल गया है और यह कहते वे वहाँ से चली गई। बाद में उन्हें पता चला कि, यह कोई और नहीं बल्कि माताजी थीं। यह जानकर, खुशी के आँसूओं से, वे फूले नहीं समायी ।
एक और घटना घटी जब वे हैदराबाद जाने के लिए ट्रेन में सवार हो रही थी, उनका पैर फिसल गया और अगर ट्रेन चल पडति तो यह उनकेलिए खतरनाक हो सकता था। उनका पर्स और चश्मा दो अलग-अलग दिशाओं में गिर गया और गंभीर निराशा से उन्होंने माताजी को … “अम्मा”…करके पुकारा। उनकी आवाज़ डर से गूँज उठी और किसी ने तुरंत उन्हें कंधों पर पकडा। लाल रंग कि बॉर्डर वाली सफ़ेद साड़ी में सजी एक महिला ने उनका पर्स और चश्मा ठीक से रख दिया। इससे प्रमिलाजी आश्चर्य चकित रह गयी कि यह माताजी के अलावा कोई और नहीं हो सकता जिनहोंने उन्हें बचाया था। जब भी यह दृश्य उनकी स्मृति में आता है, प्रमिला जी माताजी के प्रति कृतज्ञता भाव से अभिभूत हो जाती है।

सच्चाई और सद्भाव स्वभाव के गुरु अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, जिन्हें मदद की सख्त जरूरत होती है। ऐसा होने के लिए शिष्यों को गुरु के साथ आत्म का संबंध होना चाहिए। इसलिए उपर्युक्त अनुभव यह साबित करता है कि हमारे माताजी न केवल अपने सूक्ष्म शरीर के साथ, बल्कि अपने भौतिक शरीर को अपने सभी बच्चों को एक सुरक्षात्मक आध्यात्मिक परत में रखती हैं और उन्हें मौत के जबड़े से भी ढ़ाल देती हैं।यह बात एक न एक दिन, हर एक सुषुम्ना क्रिया योगियों को ज़रूर अनुभव होगा।

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