रत्तया गूडवल्ली के अनुभव

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७० वर्षीय गूडावल्ली रथैया जी १६नवंबर २०१६ को सुषुम्ना क्रिया योग में दीक्षा लेकर वे गुंटूर शहर में एक नियमित साधक हैं, जो सभी सामूहिक ध्यान प्रक्रिया और पूर्णिमा सामूहिक ध्यान में शामिल होते हैं और निः संदेह के साथ ध्यान करते हैं। २०१२ से रथैया जी ब्लेफेरोस्पाज्म के साथ सर्वाइकल और ओटोमैंडिबुलर डिस्टोनिया नामक कॉम्प्लेक्स न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर से पीड़ित थे।
ब्लेफेरोस्पाज्म आंख की मांसपेशियों कि असामान्य संकुचन कि एक स्थिति है। यह गंभीर मांसपेशियों में मरोड़ और दृष्टि में गड़बड़ का कारण बनता है। उन्होंने गुंटूर में नेत्र रोग विशेषज्ञ से परामर्श किया। फिर भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, इसलिए उन्हें न्यूरोलॉजिस्ट के पास भेजा गया। रथैया जी गुंटूर में सभी उपलब्ध न्यूरोलॉजिस्टों के आसपास गये, लेकिन यह सब व्यर्थ रहा। बाद में उन्होंने होमियो इंटरनेशनल विजयवाड़ा, तेनाली में आयुर्वेद अस्पताल में अपनी किस्मत आजमाई परंतु वहाँ पर भी उन्हें कुछ परिणाम नहीं मिला। उन्होंने बैंगलोर में डॉक्टरों से भी सलाह ली, जिन्होंने उन्हें सर्जिकल रूट में कोशिश करने का विकल्प दिया। उन्हें एक बार बोटॉक्स इंजेक्शन दिया गया था, जिससे उन्हें ड्रग रिएक्शन हो गया था जिससे उनके चेहरे पर कई दर्दनाक फफोले हो गए। जब दूसरी राय के लिए बैंगलोर के मणिपाल अस्पताल में डॉक्टरों से संपर्क किये , तो उन्होंने रथैया जी को सर्जरी कि कम सफलता दर और उच्च जटिलताओं से सावधान किया।
चिकित्सकों से चिकित्सक घूमते लंबी समय हो जाने पर, वो उपद्रव गर्भाशय ग्रीवा के डिस्टोनिया में प्रगति की, जिसके परिणामस्वरूप टॉरिकोलिसिस और ओरोमैंडिबुलर डायस्टोनिया हुआ, जिससे भोजन चबाने, भोजन निगलने और आर्टिक्यूलेशन में कठिनाई भी हुई। कनाडा और अमेरिका के डॉक्टरों ने उनकी जांच की लेकिन उनके पास कुछ भी उपाय नहीं था। अमेरिकी डॉक्टरों ने उन्हें अमेरिका में शल्य चिकित्सा संचालित करने की सलाह दी, जिसका खर्च लगभग ७५ + लाख होगा।
वे सर्वाइकल और ओरोमांडिबुलर डिस्टोनिया से ब्लेफेरोस्पाज्म से पीड़ित था। इस न्यूरोलॉजिकल विकार का कारण ज्ञात नहीं है। शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि डायस्टोनिया अज्ञातहेतुक (अज्ञात कारण) है जो आनुवांशिक असामान्यता के परिणामस्वरूप होता है या कुछ मामलों में बेसल गैन्ग्लिया और अन्य मस्तिष्क क्षेत्रों को नुकसान का कारण होता है जो मरीज़ का चाल चलन को नियंत्रित करता है। वे अज्ञातहेतुक थे और अथवा इसका कोई इलाज नहीं था।
६०–७० वर्ष की आयु में, २० महीनों से अधिक समय तक कोई भी ठोस आहार खाने में असमर्थ रहे। रथैया जी मानसिक पीड़ा और अवसाद में चले गये। मदद के लिए उनकी बेताब प्रार्थना और उनके जीवन में होने वाले कुछ चमत्कार सुषुम्ना क्रिया योग ध्यान के रूप में आए। १६ नवंबर, २०१६ को श्रीमती रमा जी,जो उनके ही अपार्टमेंट परिसर में रहती हैं उनके द्वारा रथैया जी सुषुम्ना क्रिया योग साधना में दीक्षा लिए । जल्द ही उन्होंने अपने स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव देखे।
सुषुम्ना क्रियायोग साधना समाप्त करने के एक दिन बाद, उन्होंने महसूस करा कि उनकी टोरटिकोलिस सही हो रही थी और वे अपनी गर्दन को ठीक से हिला पा रहे थे। यद्यपि उनकी गर्दन में अकडऩ का थोड़ी डिग्री का सुधार हुआ था, जिससे उनकी खुशी में कोई सीमा नहीं थी,और वे अधिक दृढ़ता और विश्वास के साथ, अपनी साधना जारी रखी। एक दिन जब वे सुषुम्ना क्रियायोग साधना में ओंकार का उच्चारण कर रहे थे, तो उन्हें लगा कि उनके मुंह से कुछ निकल कर बाहर जा रहा है और उसके अगले दिन से वे २०महीनों के लंबे अंतराल के बाद अपना भोजन चबा सके। वह अपने दैनिक भोजन को बाद में लेने में सक्षम थे।
रथैया जी की यह अद्भुत चिकित्सीय यात्रा हमारे परम गुरु श्री भोगनाथ सिद्धार जी, श्री महावतार बाबाजी और श्री आत्मानंदमयी माताजी की अद्वितीय चिकित्सक शक्तियों की बात करती है।

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