स्वर्णलता के अनुभव

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श्रीमती विजयालक्ष्मी जैसी माँ, जो सुषुम्ना क्रिया योग में तल्लीन हैं, और भक्ति, ज्ञान और त्याग से परिपूर्ण हैं, अपने आप
में एक महान सौभाग्य है!  उनकी बेटी, श्रीमती स्वर्णलता को माताजी से मिलने और २०१० में दीक्षा लेने का सौभाग्य
मिला … कनाडा में वापस आने के बाद, उसको ध्यान में आंतरिक आवाज सुनने का भाग्य हुआ ।वो आवाज़ व्यक्तित्व था – “आत्मा ही एकमात्र सत्य है – आत्मा ही  सर्वव्यापी होती है”।
उसका समझना था कि, अगर वो ध्यान के लिए अलार्म सेट नहीं करती है, तो भी हर रोज, उसी समय गुरु द्वारा उसको
जगाया जा रहा था।  सामूहिक ध्यान में, भगवान कृष्ण, विनायक जी और अंजनेय स्वामी ने उसे दर्शन दिए और कहा कि
“सुषुम्ना क्रिया योगियों को हमसे कोई इच्छा पूरी करने की आवश्यकता नहीं है।  इस ध्यान कि अभ्यास और दूसरों तक
इसे फैलाने से, आप स्वयं अपने कर्मों को मिटा सकते हैं ”।  यह संदेश सभी सुषुम्ना क्रिया योगियों के लिए सम्मान्य है।
श्री लाहरी महाशय के जन्मदिन पर, श्रीमती स्वर्णलता ने उन्हें श्री श्री श्री महावतार बाबाजी को पादनमस्कार अर्पित
करते हुए देखा।  वह यह जानती नहीं थी कि, उस दिन श्री लाहरी महाशय का जन्मदिन था।  जब वह श्रृंगेरी गुरुपूर्मनी के
लिए कनाडा से शुरू हुई, तो उसे महसूस हुआ कि गुरुओं ने उनसे एक बहुत बड़े हादसे से बचाया है।
श्रृंगेरी में, गुरुपूर्मनि पूजा के बाद, श्रृंगेरी में शारदामाता और कोल्लूरु मूकाम्बिका मठ के दर्शन के बाद , श्री अन्नपूर्णा
माताजी के मंदिर में माताजी के साथ ध्यान करते समय,उसे लगा कि माताजी श्री अन्नपूर्णा माता की मूर्ति में से प्रकट
होकर उसको तीन बार पोंगल (दक्षिण भारत का व्यंजन) प्रसाद परोसे।  जब उसने माताजी से इस दर्शन के बारे में पूछा,
तो माताजी ने जवाब में बताया “आदिशंकरा जी की आज्ञा के अनुसार, हमने उनके द्वारा स्थापित तीन देवताओं के पीठों
में ध्यान करे।  इस प्रकार तीनों देवताओं ने तुम को प्रसाद दिया है। ”… .इसका अर्थ है कि वहाँ के सभी ध्यानी ने सूक्ष्म
रूप में इस भव्य कृपा का अनुभव किया होगा परंतु श्रीमती स्वर्णलता ही इस दृश्य को देखने के लिए भाग्यशाली थी।
जब उसे तेनाली में एक क्लास आयोजित करने का अवसर मिला, तो वो मंच पर श्री माताजी के साथ भोगनाथ
सिद्धार जी, महावतार बाबाजी, लाहरी महाशय जी, युक्तेश्वर गिरि जी, परमहंस योगानंद जी को देख पा रही थी।
योग मुद्रा के साथ लाहरी महाशय का दर्शन बहुत उल्लेखनीय है!
सुषुम्ना क्रिया योगी स्वर्णलता, इस ध्यान के कारण तनाव से मुक्ती पायी।  यह उल्लेखनीय है कि उनके मित्र जो कि
ध्यानी थे, उन्होंने भी अनुभव किया कि उनकी स्वास्थ्य समस्याओं में सुधार हुआ।   मार्च में, शिवरात्रि के समय,
प्रातःकाल ध्यान के दौरान, उसने माताजी को उनके शिष्यों के साथ, ज्ञानानंद आश्रम के मुख्य द्वार पर  देखा था।
माताजी के दोनों ओर, श्री भोगनाथ महर्षि जी और श्री महावतार बाबाजी अपने शिष्यों के साथ देखे गए। एक गाय और
बछड़ा भी दिखायी दिया।  एक बड़ा हाथी माताजी को माला पहना रहा था।  श्रीमती स्वर्णलता ने रंगोली, फूल, सजावट
से भरे पूरे रास्ते का अद्भुत नजारा देखा और उसने देखा कि ऊपर से गुरुओं पर भगवान शिव-पार्वती  फूल वर्षीत कर रहे
थे ।  कनाडा में रहने वाली श्रीमती स्वर्णलता को बाद में  पता चला कि उस वर्ष शिवरात्रि समारोह ज्ञानानंद आश्रम में
भीमावरम में आयोजित किया गया था।  उसकी बेटी कृष्णाप्रिया को भी कई दिव्य अनुभव हुए।  ध्यान में, उसकी बेटी ने
देखा कि माताजी की मुद्रा से एक विश्व ऊर्जा गेंद का निर्माण किया गया था, और यह सभी की ध्यानमुद्रा में छोटी छोटी
गेंदों के रूप में बन गई।

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